ग्रामीण विकास का अभिप्राय एक ओर जहां लोगों का बेहतर आर्थिक विकास करना है वहीं दूसरी ओर वृहत सामाजिक कायाकल्प करना भी है। ग्रामीण लोगों को आर्थिक विकास की बेहतर संभावनाएं मुहैया कराने के उद्देश्या से ग्रामीण विकास कार्यक्रमों में लोगों की उत्तरोत्तर भागीदारी सुनिश्चिहत करने, योजना का विकेन्द्रीकरण करने, भूमि सुधार को बेहतर ढ़ंग से लागू करना और ऋण प्राप्ति का दायरा बढ़ाने का प्रावधान किया गया है।
प्रारम्भ में कृषि उद्योग, संचार, शिक्षा, स्वास्थ्य तथा इससे संबंधित क्षेत्रों के विकास पर मुख्य बल दिया गया था लेकिन बाद में यह महसूस किया गया कि त्वरित विकास केवल तभी संभव हो सकता है जब सरकारी प्रयासों में बुनियादी स्तर पर लोगों की प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से भागीदारी हो।
तदनुसार, 31 मार्च, 1952 को समुदाय परियोजना प्रशासन के रूप में ज्ञात एक संगठन की योजना आयोग के अधीन स्थापना की गई जिसका कार्य सामुदायिक विकास से संबंधित कार्यक्रमों का संचालन करना था। सामुदायिक विकास कार्यक्रम का उद्घाटन 2 अक्तूबर, 1952 को किया गया था और यह कार्यक्रम ग्रामीण विकास के इतिहास में एक महत्वपूर्ण कीर्तिमान था। इस कार्यक्रम में समय के साथ-साथ कई बदलाव हुए और यह विभिन्न मंत्रालयों के अधीन रहा।.
अक्टूबर, 1974 में खाद्य एवं कृषि मंत्रालय के एक भाग के रूप में ग्रामीण विकास विभाग अस्तित्व में आया। दिनांक 18 अगस्त, 1979 को ग्रामीण विकास विभाग को ग्रामीण पुनर्निर्माण मंत्रालय नामक नए मंत्रालय का दर्जा प्रदान किया गया। दिनांक 23 जनवरी, 1982 को उस मंत्रालय का नाम ग्रामीण विकास मंत्रालय कर दिया गया था। जनवरी 1985 में ग्रामीण विकास मंत्रालय को पुनः कृषि एवं ग्रामीण विकास मंत्रालय जिसे बाद में सितम्बर 1985 में कृषि मंत्रालय नाम दिया गया था, के अंतर्गत विभाग में परिवर्तित कर दिया गया। दिनांक 5 जुलाई, 1991 को विभाग का उन्नयन कर उसे ग्रामीण विकास मंत्रालय बना दिया गया। दिनांक 2 जुलाई, 1992 को इस मंत्रालय के अंतर्गत एक अन्य विभाग अर्थात बंजर भूमि विकास विभाग का सृजन किया गया। मार्च 1995 में तीन विभागों अर्थात ग्रामीण रोजगार एवं गरीबी उन्मूलन विभाग, ग्रामीण विकास तथा बंजर भूमि विकास विभाग के साथ मंत्रालय का नाम ग्रामीण क्षेत्र एवं रोजगार मंत्रालय रखा गया।.
पुनः वर्ष 1999 में ग्रामीण क्षेत्र एवं रोजगार मंत्रालय का नाम बदलकर ग्रामीण विकास मंत्रालय कर दिया गया। यह मंत्रालय व्यापक कार्यक्रमों का कार्यान्यवयन करके ग्रामीण क्षेत्रों में बदलाव लाने के उद्देश्यं से एक उत्प्रेरक मंत्रालय का कार्य करता आ रहा है। इन कार्यक्रमों का उद्देश्या गरीबी उन्मूलन, रोजगार सृजन, अवसंरचना विकास तथा सामाजिक सुरक्षा है। समय के साथ-साथ कार्यक्रमों के कार्यान्वयन में प्राप्त अनुभव के आधार पर तथा गरीब लोगों की जरूरतों का ध्यान रखते हुए कई कार्यक्रमों में संशोधन किये गये और नये कार्यक्रम शुरू किये गए। इस मंत्रालय का मुख्य उद्देश्यम ग्रामीण गरीबी को दूर करना तथा ग्रामीण आबादी विशेष रूप से गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन कर रहे लोगों को बेहतर जीवन स्तर मुहैया करना है। इन उद्देश्योंद की पूर्ति ग्रामीण जीवन और कार्यकलापों के विभिन्न क्षेत्रों से संबंधित कार्यक्रमों को तैयार करके, उनका विकास करके तथा उनका कार्यान्वयन करके की जाती है
इस बात का सुनिश्चि त करने के उद्देश्यि से कि आर्थिक सुधारों का लाभ समाज के सभी वगों को मिले ग्रामीण क्षेत्रों में जीवन स्तर के लिए महत्वपूर्ण सामाजिक तथा आर्थिक अवसंरचना के पांच कारकों की पहचान की गई। ये कारक इस प्रकार हैं- स्वास्थ्य, शिक्षा, पेयजल, आवास तथा सड़कें । इन क्षेंत्रों में किये जा रहे प्रयासों को और बढ़ाने के लिए सरकार ने प्रधान मंत्री ग्रामीण योजना (पीएमजीएसवाई) शुरू की और ग्रामीण विकास मंत्रालय को प्रधान मंत्री ग्रामीण योजना (पीएमजीएसवाई) के निम्नलिखित भागों को कार्यान्वित करने का दायित्व सौंपा गया, यथा - पेयजल आपूर्ति, आवास निर्माण तथा ग्रामीण सड़कों का निर्माण करना।
नौवीं योजना अवधि के दौरान कई गरीबी उन्मूलन कार्यक्रमों का पुनर्गठन किया गया ताकि ग्रामीण क्षेत्रों में रह रहे गरीब लोगों का उत्तमरोत्तर लाभ देने के लिए कार्यक्रमों की दक्षता बढ़ाई जा सके। एकीकृत ग्रामीण विकास कार्यक्रम (आईआरडीपी), ग्रामीण क्षेत्रों में महिला और बाल विकास कार्यक्रमों (डीडब्ल्यूसीआरए) ग्रामीण दस्तकारों को बेहतर औजारों की आपूर्ति से संबंधित कार्यक्रम (एसआईटीआरए), स्व-रोजगार के लिए ग्रामीण युवाओं के प्रशिक्षण से संबंद्ध कार्यक्रम (टीआरवाईएसईएम), गंगा कल्याण योजना (जीकेवाई) तथा मिलियन कूप स्कीम (एमडब्ल्यूएस) का विलय समग्र स्व-रोजगार योजना में किया गया जिसे स्वर्णजयंती ग्राम स्व-रोजगार योजना (एसजीएसवाई) का नाम दिया गया।
स्थानीय लोगों की जरूरतों और उनकी आकांक्षाओं को ध्यान में रखते हुए पंचायती राज संस्थाओं का सहयोग इस कार्यक्रम के कार्यान्वयन में लिया गया। ये संस्थाएं योजना तथा उसके कार्यान्वयन के विकेन्द्रीकृत विकास का रूप हैं। मंत्रालय राज्य सरकारों से जोर देकर यह कह रहा है कि वे पंचायती राज संस्थाओं को अपेक्षित प्रशासनिक तथा वित्तीय शक्तियां शीघ्रातिशीघ्र दें जैसाकि भारत के 73वें संविधान संशोधन में कहा गया है। 25 दिसम्बर, 2002 को पेयजल क्षेत्र के अधीन ‘स्वनजलधारा’ नामक नया कार्यक्रम शुरू किया गया जिसके अधीन पेयजल परियोजनाएं तैयार करने, उन्हें कार्यान्वित करने, उनका संचालन करने तथा उनका रखरखाव करने की शक्तियां पंचायतों का देने का प्रावधान हैं पंचायती राज संस्थाओं का विकास प्रक्रिया में और सहयोग लेने के उद्देश्य से माननीय प्रधान मंत्री द्वारा 27 जनवरी, 2003 को हरियाली नामक एक नया कार्यक्रम शुरू किया गया। हरियाली नामक कार्यक्रम शुरू करने का उद्देश्यव बंजर भूमि विकास कार्यक्रमों अर्थात् आईडब्ल्यूडीपी, डीपीएपी और डीडीपी के कार्यान्वयन में पंचायती राज संस्थाओं का सहयोग लेना है।
ग्रामीण महिलाओं का सशक्तिकरण ग्रामीण भारत के विकास के लिए महत्वपूर्ण है। महिलाओं को विकास की मुख्यधारा में लाना भारत सरकार का मुख्य दायित्व रहा है। इसलिए गरीबी उन्मूलन कार्यक्रमों में महिलाओं के योगदान का भी प्रावधान किया गया है ताकि इस समाज के इस वर्ग के लिए पर्याप्त निधियों की व्यवस्था की जा सके। संविधान (73वां) संशोधन अधिनियम, 1992 में महिलाओं के लिए चुनिन्दा पदों के आरक्षण की व्यवस्था है। भारत के संविधान में आर्थिक विकास तथा सामाजिक न्याय से संबंधित विभिन्न कार्यक्रमों को तैयार करके निष्पादित करने का दायित्व पंचायतों को सौंपा है। और कई केन्द्रिय प्रायोजित योजनाएं पंचायतों के जरिये कार्यान्वित की जा रही हैं। इस प्रकार, पंचायतों की महिला सदस्यों और महिला अध्यक्षों, जो बुनियादी रूप से पंचायतों की नई सदस्या हैं, का अपेक्षित कौशल प्राप्त, करना होगा और उन्हें नेतृत्व का निर्वाह करने तथा निर्णय में सहभागी होने के लिए अपनी उचित भूमिकाओं को निभाने हेतु उचित प्रशिक्षण देना होगा। पंचायती राज संस्थाओं के चुनिंदा प्रतिनिधियों को प्रशिक्षण देने का दायित्व बुनियादी रूप से राज्य सरकारों/संघ राज्य क्षेत्रों को भी कुछ वित्तीय सहायता मुहैया कराता है ताकि प्रशिक्षण कार्यक्रमों के स्तर को बेहतर बनाया जा सके और पंचायती राज संस्थाओं के चुने हुए सदस्यों और कार्यकर्ताओं के लिए क्षमता निर्माण पहलें की जा सकें।
11वीं पंचवर्षीय योजना में केंद्रीय बजट में ग्रामीण एवं फॉर्म क्षेत्र के लिए काफी ज्यादा वित्तीय प्रावधान किए गए थे, जिसके परिणामस्वरूप भारत निर्माण कार्यक्रम की उत्पजत्तिअ एवं स्थापना हुई। महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम ने व्यापक बुनियादी सहायता प्रदान की है। 13 जुलाई, 2011 से पेयजल एवं स्वच्छता विभाग को ग्रामीण विकास मंत्रालय से अलग करके उसे पेयजल एवं स्वच्छता मंत्रालय बनाया गया है।
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निम्न प्रमुख कार्यक्रमों को ग्रामीण विकास मंत्रालय द्वारा ग्रामीण क्षेत्रों में चलाया जा रहा हे।
(i) रोजगार देने के लिए महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (एमजीएनआरईजीए)
(ii) स्वरोजगार एवं कौशल विकास के लिए राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन (एनआरएलएम)
(iii) बीपीएल परिवारों को आवास उपलब्ध कराने हेतु इंदिरा आवास योजना (आईएवाई)
(iv) गुणवत्ता वाली सड़को के निर्माण के लिए प्रधान मंत्री ग्राम सड़क योजना (पीएमजीएसवाई)
(v)सामाजिक पेंशन के लिए राष्ट्रीय सामाजिक सहायत कार्यक्रम (एनएसएपी)
(vi) भूमी की उत्पादकता को बढ़ाने के लिए समेकित वाटरषेड प्रबंधन कार्यक्रम (आईडब्ल्यूएमपी)
इनके अलावा ग्रामीण कार्यकर्ताओं की क्षमता का विकास, सूचना शिक्षा और संचार और निगरानी और मूल्यांकन के लिए मंत्रालय के कार्यक्रम हैं।
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ग्रामीण विकास विभाग का वर्ष 2013-14 के लिए योजनावार परिव्यय 74,429 करोड़ रूपये है।